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Sunday, 28 February 2016

भीड़

कभी पास से गुज़र गई,
और कभी साथ खड़ी हुई,
चेहरों पे चेहरों को लपेटे,
खुद में कितने भाव समेटे,
कभी इस राह पर,
तो कभी उस राह पर,
बिना रुके, बिना थके,
उमड़ आती तूफ़ान-सी,
कभी बचपन-सी मासूम,
कभी बुढ़ापे-सी बेबस,
कहीं मिलते हंसों के जोड़े हैं,
कहीं लड़ते बेमतलब से मोहरे हैं,
लबों पे थोपे हुए एक नकली हँसी,
दबाये हुए सीने में अपने राज़ कईं,
जाने क्यों ये कभी रूकती नही,
जाने क्यों ये कभी ठहरती नही,
अजनबी-सी कभी,
तो कभी अपनी-सी,
मेरे साथ बढ़ती,
मेरे साथ चलती,
ये भीड़ होकर भी,
है महफ़िल तन्हा लोगों की|

Tuesday, 18 August 2015

आशायें...

अँधेरे रास्तों में,
बनके रोशनी-सी।
फीके जीवन में,
घुलके चाशनी-सी।।
कभी मंज़िल के निशाँ,
कभी दिल के अरमाँ।
कभी कोई ख़्वाब,
कभी कोई जवाब।।
टूटते को जोड़ गई,
भरम को तोड़ गई।
बिखरते को समेट गई,
ख्यालों में लपेट गई।।
चाहतों को ज़िंदा करके,
मुश्किलों को शर्मिन्दा करके।
हौंसलों को सख़्त करके,
सर्द रातों को तप्त करके।।
तन्हाईयों में दोस्त जैसी,
बेचैनियों में राहत जैसी।
दर्द में मलहम जैसी,
दिल की धड़कन जैसी।।
निराशाओं से उभारती,
ज़िन्दगी को सँवारती।
गिरते को सम्भालती,
हर डर से निकालती।।
अधूरी ज़िन्दगी में,
पूरी ज़िन्दगी ले आई।
ये आशायें ज़रा देखो तो,
बनके क्या-क्या ना आई।।

Wednesday, 24 June 2015

Different Faces of a Father

A father is not only a father, he is a friend, a philosopher, a guide and what not. He plays so many roles in a single life. He has many faces. And he wears all these faces beautifully. I am not an expert dealing in relationships yet i sometimes love to write on them. So, here i am writing about the different faces a father has.

1) The Father

He is playing a father's role when he is holding your hand and helping you to take the first step of your life as a child. He ia playing a father when he let you enjoy a horse ride on his back. He is a father when he holds your hand firmly in his own hand and let you feel the warmth of his hand.

2) The Friend

He is playing a friend when he is playing cricket with you or when he is running madly in the lawn. When he is breaking the window glasses of the neighbors with you at that very moment he is a friend to you. When he clings to you in your bad days he is your friend.

3) The Philosopher

When you aren't able to take the right decisions of your life he comes as a savoir and as a good philosopher he preaches the best lessons of life so that you should avoud all the mistakes of life. He even becomes Socrates for you and write his own beautiful quotes to encourage you.

4) The Guide

He is a guide to you when you are completely lost in the unreal acts of this real world. He guides you through all those moments which actually traumatize you. He guides you to the most righteous path. He becomes the last ray of hope when you are left with no hope at all.

5) The Protector

He is the protector when he saves you from those street animals, when he calls you late at night just to know whether you will be late, when he chases the boy teasing his little doll he wears the face of a protector dad. He protects you not only from the evils of outer world but also from the evils which can develop inside you.

Thus there are so many faces of a father. He is actually palying multi dimensional roles. At some moment he is doing your homework at other he is rebuking you for not finishing your homework. He is the man behind your identify. He is the one whose legacy is carried away by you. He is the one who let you know about your ancestors. He is the one who makes you familiar with the harsh lessons of life.

It's actually not that easy to be a father and it is far more difficult to wear all these faces or to play all the above mentioned roles. Not every man can be a good father. Yet the truth is every father wanna become the best father of this world. I already have written that i am not an expert dealing in relationships so you may find me wrong somewhere. And if so happens then do let me know please. I welcome feedback or rather i should write i welcome criticism. A critical appreciation is needed to improve one's skills. So, you are welcome to leave you priceless comments in comment box.

And yes no doubt the different faces of a father can't be restricted to these five numbers only. There are many other faces you have seen or are seeing or will see someday. Yet if i have something then you can add or mention it in comment box.





"This father's day, I am expressing my love towards my dad by participating in the #HugYourDad activity at BlogAdda in association with Vicks."

Friday, 19 June 2015

कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से...

याद नही कब से,
पर लिखने का शौंक है मुझे।
कभी कागजों पर,
कभी कापियों पर।
यूँ बहुत कुछ,
लिख चुकी हूँ मैं।
ना मिला कुछ तो,
किसी फटे तन्हा पन्ने पर।
काली स्याही में तो,
कभी लाल रंग में डुबो कर।
कभी एक पंक्ति में,
कभी एक शब्द में।
अपने लिए भी लिखा,
लिखा किसी ख़ास के लिए भी।
महफ़िल पर, तन्हाई पर,
इश्क़ पर, रुसवाई पर।
गुस्से पे काबू पाने को,
तो कभी किसी को जलाने को।
भाषा कभी ईशारों की थी,
तो थी कभी व्यंग्य की।
होकर बेबाक लिखा,
सोचकर बिंदास लिखा।
शब्दों को तोड़ा-मरोड़ा,
जज़्बातों को जमकर निचोड़ा।
लिख कर मिटाया बहुत बार,
कागज़ों को जलाया बहुत बार।
किसी को शिकायत रही,
तो कोई तारीफ़ करने लगा।
कोई कहने लगा पागल हो,
कोई बोला, डूबते का साहिल हो।
मुझसे शिकायत है बहुतों को,
मुझसे कोई शिकवा भी है।
यूँ साथ है दुनिया,
पर 'मन' कहीं तन्हा भी है।
मेरे शब्दों में छिपा है,
बहुत कुछ मुझसे जुड़ा।
यूँ कहानी मैंने अपनी,
आज तक कहीं लिखी नही।
पर मेरे दिल की तस्वीर,
मेरे शब्दों में क्या दिखी नही?
मैं वही हूँ जो बताते हैं शब्द मेरे,
मैं वही हूँ जो दिखाते हैं शब्द मेरे।
यूँ लिखती रहूँगी,
आख़िर शौंक है लिखना मेरा।
जड़ होते इस 'मन' को,
शब्द ही देते जान हैं।
यूँ देह चलती-फिरती है,
शब्द फूँकते इनमें प्राण हैं।
बहुत कुछ लिख चुकी हूँ,
बहुत कुछ लिखूँगी अभी।
हैं बहुत से ज़ज़्बात,
जो शब्दों में कभी उतरे ही नही।
अब सोचती हूँ एक दिन,
सम्भाल लूँ ज़रा उन्हे भी।
रख दूँ उठा के,
कहीं सलीके से।
वो जो यूँ ही फैले पड़े हैं,
कुछ ख़्याल मेरे बिखरे से।

Wednesday, 10 June 2015

ये वक़्त है भाग रहा...

फिसलता हाथों से,
रेत की तरह।
बदलता रूप कितने,
प्रेत की तरह।
जाने है सो गया,
या फिर है जाग रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

एक पल पहले था कुछ,
एक पल बाद है कुछ।
रुला रहा किसी पल में,
तो कर रहा किसी पल खुश।
ताँक रहा कल की खिड़की से,
अगले पल से है झाँक रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

कल था मेरा ये,
आज शायद है तेरा ये।
ना हुआ किसी का कभी,
ना शायद कभी होगा ही।
अपनी ही किसी दौड़ में,
ये खुद को ही पछाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

कभी दे रहा है ज़िन्दगी,
कभी बन कर आया काल है।
बेमतलब कब बीता ये,
इसके हर पल पे सवाल है।
बना रहा काम सारे कभी,
कभी सारे ही काम बिगाड़ रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

यूँ बाँध कलाई पे,
इसे चाहते हैं हम थामना।
पर ना हुआ कोई कभी,
जो कर सका हो इसका सामना।
वक़्त से वक़्त की हौड़ में,
हर वक़्त कोई हार रहा।
दौड़ रहा है सरपट,
ये वक़्त है भाग रहा।

Friday, 5 June 2015

शायद...

कभी-कभी हम जब अकेले बैठ कर अपनी ज़िन्दगी के पन्नों को पलटते हैं, तो हमारे ज़हन में ये ख़्याल उमड़ते हैं कि शायद उस दिन, उस वक़्त, उस लम्हे में अगर वो हुआ होता तो जाने आज ज़िन्दगी की तस्वीर क्या होती? क्या पता उस लम्हे में अगर कदम बढ़ा दिए होते तो शायद मंज़िल मिल ही गई होती? क्या पता अपने दिल को अगर आज़ाद छोड़ दिया होता तो शायद आज ये अपनी ख्वाहिशों के खुले आसमान में उड़ रहा होता? शायद ये हुआ होता तो वो हो गया होता, या शायद वो हुआ होता तो ये हो गया होता।

इसी उधेड़बुन में ज़्यादातर बातें जो हो चुकी हैं और ज़्यादातर लम्हे जो जिये जा चुके हैं, हम उन्हे किसी और रूप में देख या सोच लेते हैं। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि कहीं ना कहीं हमारी आज की ज़िन्दगी में कुछ तो ऐसी कमी ज़रूर रह गई है जिसकी वजह से हमारे पास आज जो भी है हम उससे खुश नही हैं। या फिर हम संतुष्ट नही हैं, ना अपने आज से, ना जो मिला है उससे। कारण चाहे जो भी हो, पर है तो सही।

आपको लग रहा होगा कि ऐसा पोस्ट कोई ऐसा ही इन्सान लिख सकता है जो अपनी ज़िन्दगी से पूरी तरह नाख़ुश होगा। पर यकीन मानिये मैं अपनी ज़िन्दगी से नाख़ुश तो बिल्कुल नही हूँ, हाँ कभी-कभी ऐसा ज़रूर लगता है कि अगर उस वक़्त ये ना होकर वो हो गया होता तो शायद आज नज़ारा ही कुछ और होता। और मेरा विश्वास कीजिये मेरी ऐसी सोच इसीलिये नही है क्यूँकि मेरे साथ आज तक जो भी हुआ है, वो सब गलत ही हुआ है। लेकिन हाँ यकीनन कुछ ऐसी चीज़ें हम सभी की ज़िन्दगियों में होती रहती हैं जो उस तरीके से नही हो पाती हैं जैसे उन्हे होना चाहिये था। या यूँ कहिये कि-

"हर किसी को यहाँ मुक्कमल जहाँ नही मिलता।
किसी को ज़मीं, तो किसी को आसमाँ नही मिलता।।"

वैसे कुछ हद तक ऐसा सोचने में बुरा भी क्या है? आप सोचिये एक बार, क्या आपके साथ कभी ऐसा नही हुआ है? क्या कभी एक बार के लिए भी आपको ये नही लगा कि अगर उस वक़्त ज़िन्दगी ने इस तरह से करवट ली होती या ना ली होती, तो इसकी तस्वीर आज कुछ और ही होती? मैं यकीन के साथ कह सकती हूँ कि आप सभी के साथ ऐसा हुआ होगा, और ज़रूर हुआ होगा। और शायद किसी के साथ तो एक से ज़्यादा बार भी हुआ हो। तो क्या ये एक नकारात्मक सोच है? क्या अपनी ज़िन्दगी की किताब के पिछले पन्नों को पलट कर देखना गलत है? क्या ऐसा करके हम अपने भूतकाल को, अपने वर्तमान और अपने भविष्य के रास्ते की रुकावट बना देते हैं? या क्या ऐसा सोच कर हम अपने बीते कल को, अपने आज और अपने आने वाले कल का शत्रु बना देते हैं?

शायद...इन सभी प्रश्नों के उत्तर आपको हाँ में मिलें अगर आप अपने कल की बुरी यादों को अपने सीने से चिपका कर बैठे रहें। लेकिन अगर आप अपने कल को सिर्फ इसलिये याद करते हैं ताकि आप बीते कल की गलतियों को ना दोहरायें तो बेशक उपर्युक्त प्रश्नों के उत्तर आपके लिए तो ना में ही होंगे। आप जब-जब बैठकर किसी भी ऐसे शायद के बारे में सोचते हैं और ये निष्कर्ष निकालते हैं कि अगर इस काम को मैंने ऐसे किया होता तो शायद सब कुछ सही हुआ होता। तो यकीन मानिये ये एक नकारात्मक नही वरन् एक सकारात्मक सोच है। यहाँ जो शायद शब्द आप प्रयोग में ला रहे हैं वो कहीं ना कहीं आपके बीते कल की गलती से आपको कुछ सिखा ही रहा है और उससे भी बढ़कर ये शब्द आपको दोबारा उस गलती को दोहराने से बचा रहा है।

तो दोस्तों मैं भी सोचती हूँ और आप भी सोचिये कि

"शायद ये हुआ होता, तो वो हो गया होता...!" :-)

Wednesday, 20 May 2015

तुम हो...तो मैं हूँ...तुम बिन...मैं क्या हूँ...

कहते हैं जननी से धन्य ना कोई हो सका है और ना ही कभी होगा। एक माँ जो अपने बच्चे को अपने ही रक्त से सींचती है, उसे अपने ही शरीर का हिस्सा देकर उसके जिस्म को रूप देती है, वह केवल जीवन नही देती है वरन् वह निर्माण करती है सृष्टि के सबसे बेहतरीन प्राणी का, अर्थात् मनुष्य का। माँ बनने का सुख शायद इस सृष्टि के सभी सुखों से ऊपर का सुख होता है। और हो भी क्यूँ ना। वह एक माँ ही तो होती है जो जीवन चक्र को आगे ले जाती है। मैंने लोगों को कहते सुना है कि वो लोग बहुत खुशनसीब होते हैं जिनके सिर पर उनकी माँ का हाथ हमेशा रहता है। जाने कितनी ही बार मैंने एक बहुत ही चर्चित गाने की इन पंक्तियों को सुना भी है और गाया भी है,
"वो होते हैं किस्मत वाले जिनकी माँ होती है...ओ माँ...!" 

और हाँ दोस्तों यकीन मानिये मैं सच में खुशकिस्मत हूँ कि मेरे सिर पर भी मेरी माँ का साया है। माँ के बिना मैं अपनी ज़िन्दगी की कल्पना भी नही कर सकती हूँ।
"वो हैं तो मैं हूँ...उन्ही से तो मैं हूँ..." 

आज भी जब मुड़के देखती हूँ तो पता ही नही चलता कि कब मेरा बचपन मुझे छोड़ कर चला गया और कब जवानी ने दस्तक दे दी। मुझे वैसे ये कभी लगता ही नही है कि मैं बड़ी होती जा रही हूँ, या मेरी उम्र साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। शायद इसका सबसे बड़ा कारण ये भी है कि आज भी जब मैं माँ को देखती हूँ तो मेरे भीतर का मेरा बचपन फिर से लौट आता है। मैं ये नही कहती कि मैं अपने पापा से प्यार नही करती हूँ। बिल्कुल करती हूँ और कसम से बहुत प्यार करती हूँ, इतना कि शायद मैं खुद एक बार उनसे लड़ भी जाऊँ लेकिन अगर कोई और उन्हें ज़रा-सा भी कुछ कह दे तो पता नही मैं क्या करुँगी। वैसे मैंने लोगों को कहते सुना है कि बेटियाँ अपने पापा के ज़्यादा करीब होती हैं। लेकिन मुझे लगता है मैं माँ के ज़्यादा करीब हूँ। कई बार तो पापा को चिढ़ाने के लिए ये भी कहती हूँ,
"हमारी तो बस माँ हैं...!" :-P


मुझे अपना बचपन याद है आज भी लेकिन जब मैं बहुत छोटी थी तो उन दिनों की याद को याद रखना तो मेरे लिए मुमकिन ही नही है। इसीलिए जब-जब मैं बचपन की कोई बात जानना चाहती हूँ तो माँ से पूछ लेती हूँ। माँ बताती हैं कि बचपन में मैं बैठी-बैठी जाने क्या सोचती रहती थी। और जब वो मुझसे पूछती थीं कि मैं क्या कर रही हूँ तो मैं बस यही बोलती थी,"सोच रही हूँ।" ;-) माँ आज भी इस बात को लेकर मजाक बनाती हैं मेरा कि जाने क्या सोचती रहती थी बचपन में। और मैं खूब हँसती हूँ ये कह कर कि देखो ना माँ बचपन से सोचती हूँ तभी तो लिखने का शौक़ है मुझे। :-P

मुझे याद है माँ मेरे स्कूल के टिफ़िन में जब-जब आलू की जीरे वाली स्पेशल सब्जी बना कर मुझे देती थीं तो मेरे सारे दोस्त मेरे टिफ़िन का सारा खाना खा जाते थे। आज भी जब मेरा दिल करता है तो माँ मेरी फ़रमाईश पर हलवा बना देती हैं। माँ बेशक़ उतना अच्छा खाना ना बनाती हों पर कुछ तो बात है उनके हाथ के खाने में कसम से। :-*

माँ ने बहुत कुछ किया है मेरे लिए, बहुत बार पापा की मार से भी बचाया है बचपन में। :-P लेकिन कभी-कभी तो माँ ने एक माँ से ज़्यादा एक दोस्त की भूमिका अदा की है मेरी ज़िन्दगी में। मुझे याद है जब मैं दिल्ली में कोचिंग के लिए गई थी तो 10 या 15 दिन के अंदर ही मेरी हिम्मत टूट गई थी। मैंने जैसे ही घर फ़ोन किया और ये कहा कि शायद मुझसे इतनी पढ़ाई नही हो पाएगी तो पापा नाराज़ हो गए थे। उनके फ़ोन के बाद माँ ने मुझे फ़ोन किया और उस वक़्त जिन शब्दों की मुझे ज़रूरत थी माँ ने बिल्कुल उन्ही शब्दों में मुझे समझाया। मेरी टूटी हिम्मत को जोड़ा, मुझे फिर से हौंसला दिया। माँ कभी-कभी जादू कर देती हैं कसम से। हर मुश्किल का हल है उनके पास, चाहे वो बड़ी हो या छोटी। और हल ना भी हो तो बस उनका साथ काफ़ी है फिर मुसीबत खुद ही भाग जाती है।

माँ ये आपके लिए,
"तुमसे ज़िन्दगी मिली,
तुमसे साँसें मिलीं।
जो भी हूँ मैं आज,
वो हस्ती तुमसे मिली।।" 

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Tuesday, 19 May 2015

वो यादें मेरे बचपन की


याद नही मुझको यूँ तो,
हर याद मेरे बचपन की।
याद नही मुझको यूँ तो,
हर बात मेरे बचपन की।
फिर भी कुछ तो है ऐसा,
जिसको मैं अब तक भूली नही।
हाँ, याद है मुझको कैसे,
माँ की गोद मेरा बिस्तर थी।
याद तो हाँ ये भी है कि
मैं तड़पती बिन माँ किस तरह थी।
माँ के पीछे-पीछे भागना था,
सबसे प्यारा खेल मेरा।
आँसूं छलक आते थे जो ना होता,
माँ से जल्दी मेल मेरा।
याद है मुझको कैसे माँ,
मेरे गिरने पर ज़मीन को मारती थी।
हाँ ये भी याद है कैसे,
उसके बाद मुझे माँ पुचकारती थी।
जब पापा आते थे ऑफिस से,
माँ किस्से उन्हें मेरे सुनाती थी।
पूरे दिन की मेरी दिनचर्या का,
माँ हाल पूरा-पूरा बताती थी।
मेरे हँसने, मेरे रोने पे कैसे,
जान माँ अपनी छिड़कती थी।
जब-जब कोई छेड़ता था मुझे,
तो माँ खूब भड़कती थी।
याद है मुझको आज भी,
माँ के हाथ की बनी सब्जी।
वो सब्जी जिसपे फ़िदा थे,
सारे ही तो दोस्त मेरे।
माँ ना थकी, ना रुकी कभी,
मेरी शरारतों पे नही की शिकायत कोई।
बचपन गया, गुज़रे साल,
ना माँ बदली, ना माँ का प्यार।
आज भी माँ वैसी ही है,
आज भी माँ प्यारी ही है।
कभी-कभी गुस्से में शायद,
मैंने उनको कुछ तो सुनाया होगा।
शायद अनजाने में ही सही,
पर दिल उनका दुखाया होगा।
माँ रूठी भी हैं, माँ नाराज़ भी हुई,
पर मोहब्बत में माँ की ना आई कमी कोई।
कभी-कभी मैं सोचती हूँ,
इतनी शक्ति माँ में कहाँ से आती है?
भला कैसे एक अकेली माँ,
सारे ही घर को सम्भाल जाती है।
एक दिन शायद मैं भी,
इस राज़ को जान जाऊँगी।
माँ किस शक्ति का है रूप,
मैं भी एक दिन पहचान जाऊँगी।
माँ को मैंने कभी ये कहा नही,
माँ को ये मैंने कभी बताया नही।
देना चाहती हूँ एक दिन मैं माँ को,
एक ख़ूबसूरत-सा तोहफ़ा।
एक अनमोल-सा, नायाब-सा,
जिसकी कोई कीमत भी ना आँक सके।
काश मैं अपनी हर बात में,
माँ की दी शिक्षा को दिखा पाऊँ।
काश मैं अपनी हर याद में,
माँ की भी एक याद को सजा पाऊँ।
यूँ सब कुछ तो मुझको याद नही,
यूँ सब कुछ तो मैं भूली भी नही।
फिर भी याद है मुझे माँ,
वो यादें मेरे बचपन की...
वो यादें मेरे बचपन की...

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Sunday, 17 May 2015

हाथों में लिए हाथ तुम्हारा


ना फ़िक्र आने वाले कल की हो,
ना चिंता मुझे अगले पल की हो।
आँखों में बस सपने हो कईं,
ज़िन्दगी लगे हर पल ही नई।
चलूँ होकर बेफ़िक्र-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना मंज़िलों से दूर होने का डर हो,
ना रास्ते में कहीं खोने का डर हो।
ज़हन में बस ख़्याल हो कईं,
ज़िन्दगी चले हर पल ही सही।
चलूँ होकर बेबाक-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना ख़ामोशी ही ख़ामोश हो,
ना तन्हाई ही बोलती हो।
दिल में बस जीने के बहाने हों कईं,
ज़िन्दगी लगे हर पल ही हसीं।
चलूँ होकर बेपरवाह-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।

ना खौफ़ ज़माने का हो,
ना ग़म कुछ खो जाने का हो।
लबों पे बस मुस्कान हों कईं,
ज़िन्दगी रहे हर पल ही खिली।
चलूँ होकर बेख़ुद-सी मैं,
हाथों में लिए हाथ तुम्हारा।